कुछ मनुष्यों में दिखाई देने वाले पशु:
बाघ, भेड़िये, लकड़बग्घे, साँप, तेंदुए, बिच्छू, गोजर
गाय, बकरी, भेड़, तितली
किसी काम को करने की यदि हमारी इच्छा नहीं है, तो वह काम कभी पूरा नहीं होगा। इसके विपरीत यदि कठिन काम भी हम शौक से शुरू करते हैं, तो भी उसे पूरा करने का रास्ता निकाल लेते हैं। संसार में इसके बहुत सुंदर उदाहरण मिलते हैं। हमारे भारत के 'मिसाइल मैन' के नाम से मशहूर डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को सभी जानते हैं। वे बहुत गरीब परिवार से थे। उन्होंने जीवन में बहुत सारी मुसीबतें देखीं और उनका सामना किया, लेकिन अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटके। इच्छाशक्ति व परिश्रम के बल पर सफलता प्राप्त की। महान आविष्कारक थॉमस एडीसन को कमजोर दिमाग के चलते स्कूल से निकाल दिया गया। कई बार असफलताएँ उनके हाथ लगीं, लेकिन अंतत: उन्होंने बल्ब का आविष्कार किया। एक विशालकाय पर्वत जिसे देखकर ही पसीने छूट जाते हैं, उसे एक साधारण से आदमी दशरथ माँझी ने अपनी प्रबल इच्छा के बल पर चीर दिया। आजादी की लड़ाई की लोगों को ऐसी लगन लगी कि लोगोंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। मदर टेरेसा को गरीबों की सेवा करने का शौक पैदा हुआ, जिसे उन्होंने पूरा भी किया। इस विश्व में अनगिनत लोग हुए, जिन्होंने अपने शौक को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया और अंतत: सफलता का स्वाद भी चखा। इससे सिद्ध होता है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो और काम के प्रति लगन अर्थात शौक हो, तो मुश्किलें स्वयं ही रास्तों से हट जाती हैं और मंजिल खुद-ब-खुद कदम चूमती है।
(१)
१. कमरे का किराया:
१. हर सप्ताह
२. तीन पाउंड
२. लेखक इनके प्रति कृतज्ञ हैं
१. अतीत में जिन लोगों ने लेखक की मदद की है।
२. भविष्य में भी जो लोग लेखक की मदद करेंगे।
(२)
१. परिच्छेद में उल्लिखित देश - इंग्लैंड
२. हर किसी को करना होगा - अपना कर्तव्य
३. लेखक की तकलीफें - आमदनी कुछ नहीं है और खर्च कई हैं
(३)
(अ)
१. स्वयं की रक्षा करना - आत्मरक्षा
२. दूसरों के उपकारों को मानने वाला - कृतज्ञ
(ब)
१. जेब - स्त्रीलिंग
२. दावा - पुल्लिंग
३. साहित्य - पुल्लिंग
(४)
कृतज्ञता का अर्थ है स्वयं की सहायता करनेवाले के प्रति कृतज्ञ होना। यह प्रार्थना, श्रद्धा, साहस, संतोष, प्रेम और परोपकार जैसे सद्गुणों के विकास की आधारशिला है। कृतज्ञता का भाव मानव के अंदर सद्चरित्र तथा परोपकार की भावना को लंबे समय तक जीवित रखता है। कृतज्ञता इंसानियत और परोपकार की एक स्नेहपूर्ण श्रृंखला है, जो मानव को मानव से जोड़ती है। यदि किसी के द्वारा किया गया कार्य हमारे लिए सुखकर या हितकारी है, तो उस कार्य के प्रति आभार प्रकट करना मानव-हृदय की सुंदर प्रवृत्ति को दर्शाता है। यही विनम्रता दूसरे व्यक्ति को भी सच्चा व्यवहार तथा परोपकार करने के लिए प्रेरित करती है। कृतज्ञता का भाव मनुष्य के हृदय की विशालता व उसके चरित्र को दर्शाता है। अत: कृतज्ञता जैसे श्रेष्ठ मानवीय गुण को अपने जीवन में उतारना चाहिए।
| अनु. | शब्द | विच्छेद | भेद |
| १. | दिग्गज | दिक् + गज | व्यंजन संधि |
| २. | सप्ताह | सप्त + अह | स्वर संधि |
| ३. | निश्चल | नि: + चल | विसर्ग संधि |
| ४. | भानूदय | भानु + उदय | स्वर संधि |
| ५. | निस्संदेह | नि: + संदेह | विसर्ग संधि |
| ६. | सूर्यास्त | सूर्य + अस्त | स्वर संधि |
| शब्द | संधि विच्छेद | संधि भेद |
| सज्जन | सत् + जन | व्यंजन संधि |
| संधि विच्छेद | संधि शब्द | संधि भेद |
| दुः + लभ | दुर्लभ | विसर्ग संधि |
| अनु. | शब्द | विच्छेद | संधि भेद |
| १. | अपेक्षा | अप + ईक्षा | स्वर संधि |
| २. | निर्जीव | नि: + जीव | विसर्ग संधि |
| ३. | स्वार्थी | स्व + अर्थी | स्वर संधि |
| ४. | संपूर्ण | सम् + पूर्ण | व्यंजन संधि |
| ५. | उज्ज्वल | उत् + ज्वल | व्यंजन संधि |