| करते जाओ पाने की मत सोचो जीवन सारा। |
भीतरी कुंठा नयनों के दुवार से आई बाहर। |
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हमें पूरा जीवन काम करते रहना चाहिए। यह नहीं सोचते रहना चाहिए कि हमें क्या प्राप्त होगा। |
जब नेत्रों से अश्रु बहते हैं तो यह मानना चाहिए कि मन की कुंठा नयन रूपी द्वार से बाहर आ रही है। |
कवि कहता है कि रेल की पटरियाँ मौन होकर उसके साथ-साथ चलती हैं, लेकिन वे कभी इसका घमंड नहीं करते।कवि यहाँ संदेश देना चाहता है कि जो हमारे शुभचिंतक होते हैं, वे बिना किसी दिखावे के हर परिस्थिति में हमारा साथ देते हैं। वास्तव में ऐसे शुभचिंतक परछाई की तरह होते हैं, जो हर परिस्थिति में हमारे साथ रहते हैं। मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर हमारी मदद करते हैं।
इस काव्यांश में गुलाब के फूल को जीवन संघर्षों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। यह फूल काँटों के बीच रहकर भी मुस्कराता है, जिससे यह संदेश मिलता है कि हमें कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों से डरना नहीं चाहिए। जैसे गुलाब काँटों के बीच रहकर भी अपनी सुंदरता और मुस्कान नहीं खोता, वैसे ही हमें भी जीवन की चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। यह पंक्तियाँ हमें साहस, धैर्य और सकारात्मक सोच की प्रेरणा देती हैं।
आकाश का सूना होना।
उन गीतों का अमर हो जाना।
कवि कहते है कि मन में जो पीड़ा है, वह बादल बनकर आँखों में छा गई और आँखों से अश्रुओं की वर्षा होने लगी। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि अक्सर मन का दुख आँसुओ से ही प्रकट होता है।
| अ | उत्तर |
| मछली | प्यासी |
| गीतों के स्वर | अमर |
| रेल की पटरियाँ | मौन |
| आकाश | सूना |
छिपे हुए - सीतारे |
धुल गए - विषाद |
मँझधार में डोले - जीवन नैया |
अमर हुए - गीतों के स्वर।
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दिनांक: १५ जनवरी, २०१८ [email protected] प्रिय मित्र, आपका पत्र दो दिन पूर्व ही मिला। विद्यालय की वक्तृत्व प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त होने के उपलक्ष्य में आपकी तरफ से मिली बधाई को मैं स्वीकार करते हुए आपको धन्यवाद देता हूँ। इस सफलता से मेरे माता-पिता बहुत खुश हैं और मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि इस खुशी में आप भी सहभागी हैं। तुम्हारा मित्र, अमन गुलाटी,
१५४/मनन नगर, दादर, मुंबई। [email protected] |